उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tujhse hargiz bhi adawat main nahin kar sakta

तुझ से हरगिज़ भी अदावत मैं नहीं कर सकता

تجھ سے ہرگز بھی عداوت میں نہیں کر سکتا

शायर: Nadeem Asghar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुझ से हरगिज़ भी अदावत मैं नहीं कर सकता
अब किसी और की चाहत मैं नहीं कर सकता

पढ़ चुका हद से ज़ियादा मैं नमाज़ें दुख की
इस से बढ़ कर तो इबादत मैं नहीं कर सकता

दिल को बुत-ख़ाना बना कर मैं तुझे सज्दे करूँ
अपने रब से ये बग़ावत मैं नहीं कर सकता

चप्पे चप्पे पे हों तहरीर क़ियाम और सुजूद
या-ख़ुदा इतनी रियाज़त मैं नहीं कर सकता

तू तो इस वक़्त का मंसूर है अब मेरे 'नदीम'
तेरी बातों की हिमायत मैं नहीं कर सकता