उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tera husn hai wo sahba ki koi misal kya de

तिरा हुस्न है वो सहबा कि कोई मिसाल क्या दे

ترا حسن ہے وہ صہبا کہ کوئی مثال کیا دے

शायर: Gauhar Usmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरा हुस्न है वो सहबा कि कोई मिसाल क्या दे
कभी तिश्नगी बुझा दे कभी तिश्नगी बढ़ा दे

ये जहाँ है इक तमाशा कोई दोस्त है न दुश्मन
वही आग रौशनी दे वही आशियाँ जला दे

ये तरीक़-ए-दिलबरी है कि अदा-ए-दिल-नवाज़ी
किसी जुर्म पर नवाज़े किसी जुर्म पर सज़ा दे

अभी ज़ुल्मत-ए-ख़िरद में है वफ़ा की ताबनाकी
ये चराग़ बुझ न जाए कोई इस की लौ बढ़ा दे

ये क़दम क़दम पे ज़ुल्मत ये रविश रविश अँधेरे
मिरी बे-ख़ुदी कहाँ है मुझे रास्ता बता दे

ये तसव्वुर-ए-रिहाई रहे क्यूँ नज़र में 'गौहर'
मुझे क़ैद करने वाले मिरे बाल-ओ-पर जला दे