उर्दू शायरी · ग़ज़ल

thakan se tan-badan TuTa paDa hai

थकन से तन-बदन टूटा पड़ा है

تھکن سے تن بدن ٹوٹا پڑا ہے

शायर: Nafas Ambalvi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

थकन से तन-बदन टूटा पड़ा है
मसाफ़त को मगर रस्ता पड़ा है

लहू से तर-ब-तर हैं पाँव लेकिन
हमें हर हाल में चलना पड़ा है

यहाँ मैं तिश्नगी से जाँ-बलब हूँ
उधर मीलों अभी सहरा पड़ा है

कोई साँसें भला कब तक ख़रीदे
ये सौदा तो बहुत महँगा पड़ा है

ये रात अब तक नहीं सुलझी है मुझ से
उधर दिन भी अभी उलझा पड़ा है

मैं आख़िर अब इसे कैसे सँभालूँ
यहाँ तो घर का घर बिखरा पड़ा है

बहुत बेचैन सा रहता हूँ दिन-भर
सुना है गाँव में सूखा पड़ा है

बुलाता है मुझे आवाज़ दे कर
वो मेरे घर का जो मलबा पड़ा है

मिरा चंदा गया परदेस जब से
ये घर आँगन बहुत सूना पड़ा है

बहुत बेज़ार से लगते हो तुम भी
असर तुम पर 'नफ़स' गहरा पड़ा है