उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam shahr to be-mehr nind so raha tha

तमाम शहर तो बे-मेहर नींद सो रहा था

تمام شہر تو بے مہر نیند سو رہا تھا

शायर: Jabbar Wasif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाम शहर तो बे-मेहर नींद सो रहा था
मगर मैं आँखों में नोक-ए-क़लम चुभो रहा था

मैं जानता था मिरे अश्क मरने वाले हैं
मैं जानता था कि जो मेरे साथ हो रहा था

मुझे ख़बर नहीं कब आँसुओं को होश आया
ख़बर हुई तो मैं ज़ार-ओ-क़तार रो रहा था

कुछ इस लिए भी ख़ुदा की मुझे ज़रूरत थी
मैं अपने खेत में गंदुम के बीज बो रहा था

ख़याल आया मुझे जब ख़ुदा बदलने का
मैं अपने अश्कों से हर्फ़-ए-दुआ भिगो रहा था

मुझे जगा दिया जब फज्र के मुअज़्ज़िन ने
दरून-ए-ख़्वाब मैं मस्जिद का सहन धो रहा था

समझ रहा था जिसे मैं भी नूह की कश्ती
उसी का नाख़ुदा लोगों को अब डुबो रहा था

था बा-नसीब भी और बद-नसीब भी 'वासिफ़'
जो पा रहा था किसी को किसी को खो रहा था