उर्दू शायरी · ग़ज़ल

talab ki aag kisi shoala-ru se raushan hai

तलब की आग किसी शो'ला-रू से रौशन है

طلب کی آگ کسی شعلہ رو سے روشن ہے

शायर: Qabil Ajmeri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तलब की आग किसी शो'ला-रू से रौशन है
ख़याल हो कि नज़र आरज़ू से रौशन है

जनम जनम के अँधेरों को दे रहा है शिकस्त
वो इक चराग़ कि अपने लहू से रौशन है

कहीं हुजूम-ए-हवादिस में खो के रह जाता
जमाल-ए-यार मिरी जुस्तुजू से रौशन है

ये ताबिश-ए-लब-ए-लालीं ये शो'ला-ए-आवाज़
तमाम बज़्म तिरी गुफ़्तुगू से रौशन है

विसाल-ए-यार तो मुमकिन नहीं मगर नासेह
रुख़-ए-हयात इसी आरज़ू से रौशन है