उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aalam-e-soz-e-tamanna be-karan karte chalo

आलम-ए-सोज़-ए-तमन्ना बे-कराँ करते चलो

عالم سوز تمنا بے کراں کرتے چلو

शायर: Qabil Ajmeri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आलम-ए-सोज़-ए-तमन्ना बे-कराँ करते चलो
ज़र्रे ज़र्रे को शरीक-ए-कारवाँ करते चलो

कितने रौशन हैं वो 'आरिज़ कितने शीरीं हैं वो लब
रास्ता कट जाएगा ज़िक्र-ए-बुताँ करते चलो

शाम-ए-ग़म की ज़ुल्मतें हैं और सहरा-ए-हयात
दीदा-ए-बेदार को अंजुम-फ़िशाँ करते चलो

रास्ते में बुझ न जाएँ आरज़ुओं के चराग़
ज़िक्र-ए-मंज़िल कारवाँ-दर-कारवाँ करते चलो

जाने किस 'आलम में आएँ आने वाले क़ाफ़िले
साया-ए-दीवार-ए-जानाँ जावेदाँ करते चलो

मज़हर-ए-तहज़ीब है इक एक तार-ए-पैरहन
बस यूँही अंदाज़ा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ करते चलो