उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab ye aalam hai ki gham ki bhi KHabar hoti nahin

अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं

اب یہ عالم ہے کہ غم کی بھی خبر ہوتی نہیں

शायर: Qabil Ajmeri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं
अश्क बह जाते हैं लेकिन आँख तर होती नहीं

फिर कोई कम-बख़्त कश्ती नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गई
वर्ना साहिल पर उदासी इस क़दर होती नहीं

तेरा अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल है जुनूँ में आज कल
चाक कर लेता हूँ दामन और ख़बर होती नहीं

हाए किस आलम में छोड़ा है तुम्हारे ग़म ने साथ
जब क़ज़ा भी ज़िंदगी की चारा-गर होती नहीं

रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब
चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं

इज़्तिराब-ए-दिल से 'क़ाबिल' वो निगाह-ए-बे-नियाज़
बे-ख़बर मालूम होती है मगर होती नहीं