उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tabiron ko DhunD rahi hun KHwabon ki parwah nahin

ता'बीरों को ढूँढ़ रही हूँ ख़्वाबों की परवाह नहीं

تعبیروں کو ڈھونڈ رہی ہوں خوابوں کی پرواہ نہیں

शायर: Vala Jamal Al Aseeli5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ता'बीरों को ढूँढ़ रही हूँ ख़्वाबों की परवाह नहीं
मंज़िल पर ही नज़र है मेरी रस्तों की परवाह नहीं

उस को क्या मा'लूम कि सदियाँ लम्हों से ही बनती हैं
सदियों की है फ़िक्र उसे इन लम्हों की परवाह नहीं

अपने-पन का मतलब भी तो लोगों को मा'लूम नहीं
मेरा अपना वो है जिस को अपनों की परवाह नहीं

मैं ने दिल में ठान लिया था ज़ंजीरों को तोडुँगी
लेकिन मेरे दिल ने पूछा रिश्तों की परवाह नहीं

हम ने खाए ज़ख़्म 'विला' हम उन से दूर ही रहते हैं
फूलों से वो खेले जिस को काँटों की परवाह नहीं