उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suraj jaisa jism tha jis se baiThe the hum saT ke

सूरज जैसा जिस्म था जिस से बैठे थे हम सट के

سورج جیسا جسم تھا جس سے بیٹھے تھے ہم سٹ کے

शायर: Nadim Nadeem9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सूरज जैसा जिस्म था जिस से बैठे थे हम सट के
आँखें चौधाईं तो हम ने देखा पीछे हट के

जन्नत से उकताए हुए दो दिल दुनिया में रम गए
आसमान से गिरने वाले आ के खजूर में अटके

रौशनिय्यों से भागने वाले लोग हैं देखो इन की
आँखों को इस्क्रीनें खा गईं और दिलों को खटके

बिल्लियों भागे छींके टूटे और क़िस्मत के मारे
कव्वों को भरने पड़ रहे हैं कंकर चुन चुन मटके

'उम्रें बीत गईं तब जा कर काम हुनर आए हैं
फंदे लगाना सीख गए हैं हम रस्सी बट बट के

'इश्क़ है रेगिस्तान सो इस में कैसे सावन भादों
कभी कभी आ जाते हैं कुछ बादल भूले भटके

प्रेम-नगर में माँगने वाले भूखों मर जाते हैं
इस बस्ती में खा नहीं सकता कोई छीन झपट के

उस के सामने यूँ हैं जैसे साँप ने सूँघ लिया हो
होंटों पे ताले लग गए हैं आज हर इक मुँह-फट के

राजा जी तो जो भी जी में आया बके जाते थे
अम्माँ झुँझला कर ये बोलीं आग लगे लम्पट के