उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suraj

सूरज

سورج

शायर: Ghaus Khah makhah Hyderabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी जब ख़ुद से घबराता है सूरज
टहल कर जी को बहलाता है सूरज

तपिश जब हद से बढ़ती है बदन की
समुंदर में उतर जाता है सूरज

मिटाने भूक अपनी मुँह अंधेरे
अँधेरों को निगल जाता है सूरज

सवेरे बदलियाँ जब छेड़ती हैं
तुलूअ' होने से शरमाता है सूरज

सर-ए-मग़रिब बुझा देता है ख़ुद को
सुब्ह होते ही जल जाता है सूरज

ज़मीं को रौशनी देने न जाने
कहाँ से रौशनी पाता है सूरज

महीनों तक कहीं रू-पोश रह कर
ज़मीं पर बर्फ़ बर्फ़ाता है सूरज

कभी ऐसा भी होता है ज़मीं पर
महीनों आग बरसाता है सूरज

सवेरे 'ख़्वाह-मख़ाह' मुझ को उठाने
मिरी खिड़की में आ जाता है सूरज