उर्दू शायरी · ग़ज़ल

paband nahin hain

पाबंद नहीं हैं

پابند نہیں ہیں

शायर: Ghaus Khah makhah Hyderabadi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वा'दा क्या किसी बात के पाबंद नहीं हैं
बूढ़े हैं ना जज़्बात के पाबंद नहीं हैं

ख़्वाबों में निकल जाते हैं अरमान हमारे
हम दिन में मुलाक़ात के पाबंद नहीं हैं

बे-वज्ह भी आँखों में उमड आते हैं अक्सर
सैलाब जो बरसात के पाबंद नहीं हैं

हालात की गर्दिश रही पाबंद हमारी
हम गर्दिश-ए-हालात के पाबंद नहीं हैं

जब वक़्त के पाबंद नहीं आप तो हम भी
पाबंदी-ए-औक़ात के पाबंद नहीं हैं

हम रिंद-ए-ख़राबात हैं जो चाहे पिएँगे
साक़ी की हिदायात के पाबंद नहीं हैं

ज़ंजीर लिए पाँव में फिरते हैं सर-ए-राह
दीवाने हवालात के पाबंद नहीं हैं

हाकिम ने कहा है कि वही हुक्म को टालें
जो मर्ग-ए-मुफ़ाजात के पाबंद नहीं हैं

मफ़्हूम शब-ए-वस्ल का समझाया तो बोले
हम ऐसी किसी रात के पाबंद नहीं हैं

ये दौर तरक़्क़ी का है हम शर्म-ओ-हया की
फ़र्सूदा रिवायात के पाबंद नहीं हैं

हम 'ख़्वाह-मख़ाह' पाबंद हैं आते हुए पल के
गुज़रे हुए लम्हात के पाबंद नहीं हैं