उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suna tha neza-o-talwar-o-KHanjar bech Dale hain

सुना था नेज़ा-ओ-तलवार-ओ-ख़ंजर बेच डाले हैं

سنا تھا نیزہ و تلوار و خنجر بیچ ڈالے ہیں

शायर: Nafas Ambalvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुना था नेज़ा-ओ-तलवार-ओ-ख़ंजर बेच डाले हैं
मगर ज़िल्ल-ए-इलाही ने तो लश्कर बेच डाले हैं

पड़ी हैं रेत के टीलों पे टूटी कश्तियाँ अपनी
हुआ है अब के मौजों ने समुंदर बेच डाले हैं

अगर वो मेरी आँखें बेच देता तो मुनासिब था
मगर उस ने तो इन आँखों के मंज़र बेच डाले हैं

किसी ने एहतिरामन इक ‘अजाइब-घर के कमरे में
हमारे जिस्म रक्खे हैं मगर सर बेच डाले हैं

मोहब्बत से भरे ख़त भेजते रहते थे जो अक्सर
अब उन लोगों ने भी अपने कबूतर बेच डाले हैं

किसी दिन अपने बच्चों से लिपट कर रोएँगे नादाँ
जिन्हों ने शहर जा कर गाँव के घर बेच डाले हैं

ये वो एहसान है तुझ से जो मरते दम न उतरेगा
कि तेरी परवरिश में माँ ने ज़ेवर बेच डाले हैं