उर्दू शायरी · ग़ज़ल

subh ko nikla tha garche karr-o-far se aaftab

सुब्ह को निकला था गरचे कर्र-ओ-फ़र से आफ़्ताब

صبح کو نکلا تھا گرچہ کر و فر سے آفتاب

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुब्ह को निकला था गरचे कर्र-ओ-फ़र से आफ़्ताब
मुँह फिराया हो ख़जिल उस इश्वा-गर से आफ़्ताब

आसमाँ पर गर गिरे बर्क़-ए-निगाह-ए-तुंद-बार
अब्र में रह जाए छुप कर उस के डर से आफ़्ताब

गर नक़ाब अपनी उलट दे वो रुख़-ए-ताबिंदा से
गिर पड़े बेताब हो कर चर्ख़ पर से आफ़्ताब

दिल में जब से देखता है वो तिरी तस्वीर को
नूर बरसाता है अपनी चश्म-ए-तर से आफ़्ताब

हैबत-ए-शाह-ए-दकन से 'शाद' ये शोहरा है आज
काँपता निकला करे जेब-ए-सहर से आफ़्ताब