उर्दू शायरी · ग़ज़ल

subh-dam raqs karte parindon ke sar par thirakti hawa

सुब्ह-दम रक़्स करते परिंदों के सर पर थिरकती हवा

صبح دم رقص کرتے پرندوں کے سر پر تھرکتی ہوا

शायर: Aaditya Aab5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुब्ह-दम रक़्स करते परिंदों के सर पर थिरकती हवा
रात भर जलते बुझते दिए की थकन हो गई लापता

'ऐन-मुमकिन है अपना तसव्वुर उसी वक़्त दम तोड़ दे
'ऐन-मुमकिन है मुँह ताकने के लिए मिल सके आइना

बल्ब से मुंसलिक हो चुके हैं सभी रौशनी के लिए
किस को है आज-कल फ़िक्र-ए-बाब-ए-सहर बंद है या खुला

एक शय डूबती तैरती मुझ को आवाज़ देती रही
मैं किनारे किनारे नदी के 'अबस भागता रह गया

हम कि नज़रें झुकाए क़दम पर क़दम आगे रखते रहे
जाने किस यास में कुछ नहीं कह सके ख़ैर कहते भी क्या