उर्दू शायरी · ग़ज़ल

soch lije kyon azab aaya tha qaum-e-hud par

सोच लीजे क्यों 'अज़ाब आया था क़ौम-ए-हूद पर

سوچ لیجے کیوں عذاب آیا تھا قوم ہود پر

शायर: Jabbar Wasif12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोच लीजे क्यों 'अज़ाब आया था क़ौम-ए-हूद पर
और फिर कुछ ग़ौर कीजे लम्हा-ए-मौजूद पर

सौ तरह की ख़्वाहिशें पेशानियों पर दर्ज हैं
लग रहा है साजिदों का क़र्ज़ है मस्जूद पर

रोज़-ए-अव्वल से जहाँ में दो तरह का है यक़ीं
एक इब्राहीम पर और दूसरा नमरूद पर

सूरा-ए-इख़लास की तस्वीर है गर ईश्वर
मेरा भी ईक़ान है फिर आप के मा'बूद पर

रात फिर मेरी ख़ुदा से फज्र तक गप-शप हुई
रात फिर हँसते रहे हम दोनों हस्त-ओ-बूद पर

शाम को फिर याद आई शाम के बाज़ार की
फिर किया मैं ने तबर्रा शाम के मरदूद पर

याद आ जाती हैं अब भी कूड़ा-करकट देख कर
भिनभिनाती मक्खियाँ इक तिफ़्ल-ए-नौ-मौलूद पर

हो सके तो दह्र का नक़्शा उठा कर देखिए
किस क़दर महदूद हैं हम अर्ज़-ए-ला-महदूद पर

तीन चौथाई सदी से चल रहे हैं क़ाफ़िले
हिज्रती पहुँचे नहीं हैं मंज़िल-ए-मक़्सूद पर

सिर्फ़ इतना ही कहूँगा मैं सिपह-सालार से
आप सिगरेट पी रहे हैं बैठ कर बारूद पर

बाप हूँ सो एक ही मसरफ़ है मेरी ज़ीस्त का
ख़र्च होना है मुझे औलाद की बहबूद पर

दोस्तों की क़द्र 'वासिफ़' पूछिए उस शख़्स से
वक़्त पड़ने पर लिया हो क़र्ज़ जिस ने सूद पर