उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shuur mein wo silsila guman ka nahin raha

शु'ऊर में वो सिलसिला गुमान का नहीं रहा

شعور میں وہ سلسلہ گمان کا نہیں رہا

शायर: Ibraheem Khalil6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शु'ऊर में वो सिलसिला गुमान का नहीं रहा
ख़याल मौज-ए-दहर में निशान का नहीं रहा

जो सात आसमानों के ख़ला की वुस'अतों में था
फ़ना हुआ तो एक आसमान का नहीं रहा

ज़बान लड़खड़ा गई गुमान महव हो गया
वो गिर गया जिसे हुनर बयान का नहीं रहा

शु'ऊर के सिपुर्द कर ज़बान की लगाम को
वगरना शहसवार फिर उठान का नहीं रहा

वो अपना सर उठा रहा था बाज़ुओं के ज़ोर पर
वो जितना फड़फड़ाए पर उड़ान का नहीं रहा

तमाम साम'ईन तालियाँ बजा के जा चुके
'ख़लील' तुझ को होश ही धियान का नहीं रहा