उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere pahlu mein kisi jism ka saya tha magar

मेरे पहलू में किसी जिस्म का साया था मगर

میرے پہلو میں کسی جسم کا سایہ تھا مگر

शायर: Ibraheem Khalil6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरे पहलू में किसी जिस्म का साया था मगर
वो मिरे पास बहुत दूर से आया था मगर

पर्दा हटते ही वही देखी दिखाई फिल्में
रस्म-ए-दुनिया का वही खेल-तमाशा था मगर

अब कहाँ मौज-ए-सर-ए-दहर में लफ़्ज़ों का भँवर
वर्ना मिट्टी तो बताती है कि दरिया था मगर

जड़ उखड़ने पे कहाँ सा’अत-ए-सब्ज़ आई है
मुझ पे बादल तो बहुत ज़ोर से बरसा था मगर

ख़ुद से बिछड़े हुए इक और बरस बीत गया
अपने अंदर से निकलते हुए रोया था मगर

कौन ता-'उम्र फ़लक-बोस रहा होगा 'ख़लील'
वर्ना अफ़्लाक से रिश्ता मिरा दोहरा था मगर