उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shajar bolte hain hajar bolte hain

शजर बोलते हैं हजर बोलते हैं

شجر بولتے ہیں حجر بولتے ہیں

शायर: Zafar Naseemi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शजर बोलते हैं हजर बोलते हैं
सफ़र में मिरे हम-सफ़र बोलते हैं

मैं तन्हा भी रहता हूँ महव-ए-तकल्लुम
मिरे घर के दीवार-ओ-दर बोलते हैं

ज़बाँ को इजाज़त न हो बोलने की
तो बे-साख़्ता बाल-ओ-पर बोलते हैं

अगर मसअले अंजुमन में न सुलझें
तो मैदाँ में तीर-ओ-तबर बोलते हैं

ख़ुदा इस तरफ़ है ख़ुदाई उधर है
सना-ख़्वान-ए-मशरिक़ किधर बोलते हैं

हुनर-मंद करते नहीं ख़ुद-सताई
छुपे हैं जो उन में हुनर बोलते हैं

शहीदों के जिस्मों से क्या पूछते हो
रखे तश्त में उन के सर बोलते हैं