उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hae kya pur-fareb sazish hai

हाए क्या पुर-फ़रेब साज़िश है

ہائے کیا پر فریب سازش ہے

शायर: Zafar Naseemi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाए क्या पुर-फ़रेब साज़िश है
शहर का शहर नज़्र-ए-आतिश है

जाम-ए-जमशेद ज़ेर-ए-गर्दिश है
देखते जाइए नुमाइश है

आम ज़ुल्म-ओ-सितम का चर्चा क्यों
ख़ास लुत्फ़-ओ-करम की बारिश है

पूछती है ज़बान ख़ंजर की
क्या अभी ज़िंदगी की ख़्वाहिश है

ख़ौफ़-ओ-दहशत के सूने जंगल में
सब्र-ओ-हिम्मत की आज़माइश है

अक़्ल के दुश्मनों को क्या कहिए
इल्म के मख़ज़नों पे बंदिश है

क्या अभी साँस ले रहे हो 'ज़फ़र'
जी हुज़ूर आप की नवाज़िश है