उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shahidon ka tere shohra zamin se aasman tak hai

शहीदों का तिरे शोहरा ज़मीं से आसमाँ तक है

شہیدوں کا ترے شہرہ زمیں سے آسماں تک ہے

शायर: Urooj Qadri10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शहीदों का तिरे शोहरा ज़मीं से आसमाँ तक है
फ़लक से बल्कि आगे बढ़ के तेरे आस्ताँ तक है

जमाल-ए-जाँ-फ़िज़ा का उन के दिलकश दिल-रुबा जल्वा
ज़मीं से आसमाँ तक है मकाँ से ला-मकाँ तक है

रहें सब मुतमइन गुलशन में अपने आशियानों से
कि जौलाँ-गाह बिजली की हमारे आशियाँ तक है

नसीहत पर अमल ख़ुद भी तो करना चाहिए वाइज़
असर क्या हो कि तेरा वा'ज़ तो नोक-ए-ज़बाँ तक है

मुसलमानी फ़क़त तस्बीह-ख़्वानी ही नहीं हमदम
मुसलमानी का लम्बा हाथ शमशीर-ओ-सिनाँ तक है

बुढ़ापा फ़िक्र पर आए तो नक्बत साथ आती है
तरक़्क़ी और अज़्मत क़ौम की फ़िक्र-ए-जवाँ तक है

फ़क़त दुनिया ही उस की गूँज का हल्क़ा नहीं हरगिज़
तिरी हम्द-ओ-सना की गूँज गुलज़ार-ए-जिनाँ तक है

मैं हूँ पैग़ाम-ए-हक़ इस्लाम मेरा नाम-ए-नामी है
जहाँ तक है ये दुनिया मेरा हल्क़ा भी वहाँ तक है

वही अल्फ़ाज़ हैं मौज़ूँ अगर हों शे'र होते में
हक़ीक़त शाइ'री के फ़न की बस हुस्न-ए-बयाँ तक है

तवील इतनी है ज़ंजीर-ए-असीरी इस ज़माने में
कि हाज़िर क़ैद-ख़ाने में ‘उरूज’-ए-ना-तवाँ तक है