उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham ka rang jo gahra hua aaine mein

शाम का रंग जो गहरा हुआ आईने में

شام کا رنگ جو گہرا ہوا آئینے میں

शायर: Ghayas Mateen6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम का रंग जो गहरा हुआ आईने में
इक सितारा सा चमकने लगा आईने में

सब खिलौनों की तरह टूट रहे हैं पल-पल
और ये मंज़र मुझे डसता हुआ आईने में

गर्दिश-ए-वक़्त सँभलने नहीं देती मुझ को
सिलसिला टूटता बनता रहा आईने में

देख कर लहरों की शोरीदा-सरी याद आया
एक चेहरा कभी देखा हुआ आईने में

उस की आँखों में उतरते हुए महसूस हुआ
इक नए शहर का रस्ता मिला आईने में

आइना देख के क्यों चीख़ते रहते हो 'मतीन'
क्या कोई और है बैठा हुआ आईने में