उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil jala phir charagh jalte hi

दिल जला फिर चराग़ जलते ही

دل جلا پھر چراغ جلتے ہی

शायर: Ghayas Mateen9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल जला फिर चराग़ जलते ही
अपने दुख भी हैं शाम जैसे ही

कितने चेहरे उतर गए देखो
धूप दीवार से उतरते ही

मौसमों का पता चला मुझ को
रंग दीवार का बदलते ही

हम ने दरिया में रास्ता पाया
इक तिरा नाम ले के चलते ही

ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत है
हाँ मगर साँस के उखड़ते ही

'मीर' की याद आ गई हम को
सुब्ह करते ही शाम करते ही

एक ज़िंदा मिसाल थी न रही
हाए उस आदमी के मरते ही

टूटना अपने दिल का याद आया
आइना टूट कर बिखरते ही

तेरा लहजा 'मतीन' ऐसा है
फूल झड़ते हैं बात करते ही