उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is taraf aag ka dariya hai udhar khai hai

इस तरफ़ आग का दरिया है उधर खाई है

اس طرف آگ کا دریا ہے ادھر کھائی ہے

शायर: Ghayas Mateen9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस तरफ़ आग का दरिया है उधर खाई है
हम ने भी पार उतरने की क़सम खाई है

अपने कमरे से निकल कर ज़रा देखो तो सही
धूप दीवार से आँगन में उतर आई है

जिन चराग़ों का तिरे नाम से रिश्ता ही नहीं
उन चराग़ों की ज़माने में पज़ीराई है

रात की शाख़ से लटके हैं सितारों के चराग़
घर की दहलीज़ पे बैठी हुई तन्हाई है

ऐसा मौसम है कि बे-बर्ग-ओ-समर हैं अश्जार
क्यों हवा शोर मचाने को चली आई है

धूप के शहर में बादल को तरसने वालो
आज बारिश नहीं होगी ये ख़बर आई है

जिस पे दीवार के उस पार का मंज़र न खुले
ऐसी बीनाई भी किस काम की बीनाई है

अपने अंदर का ये आलम भी अजब आलम है
भीड़ की भीड़ है तन्हाई की तन्हाई है

मुझ पे इल्ज़ाम है आहिस्ता-ख़िरामी का 'मतीन'
तेज़ चलता हूँ तो अहबाब की रुस्वाई है