उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shabash ashk-e-gham koi charcha kiye baghair

शाबाश अश्क-ए-ग़म कोई चर्चा किए बग़ैर

شاباش اشک غم کوئی چرچا کئے بغیر

शायर: Raft Bahraichi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाबाश अश्क-ए-ग़म कोई चर्चा किए बग़ैर
कह दी जो बात कहनी थी शिकवा किए बग़ैर

बनती नहीं है बात तक़ाज़ा किए बग़ैर
या'नी उन्हीं से उन की तमन्ना किए बग़ैर

वल्लाह और जल्वों की बढ़ जाए अहमियत
कोई रहे जो सामने पर्दा किए बग़ैर

जाता हूँ राह-ए-'इश्क़ में मर्दाना-वार मैं
बर्बादियों की कोई भी परवा किए बग़ैर

तुम को भी दाद देनी पड़े जज़्ब-ए-‘इश्क़ की
मिल जाओ तुम जो मुझ को तमन्ना किए बग़ैर

बंदा-नवाज़ इतना है तुम से मुझे लगाव
दिल मानता नहीं तुम्हें सज्दा किए बग़ैर

'राफ़त' कभी न होगा मुकम्मल जुनून-ए-‘इश्क़
तार-ए-नफ़स से हर नफ़स उलझा किए बग़ैर