उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghabra ke jaan di ho agar hijr-e-yar mein

घबरा के जान दी हो अगर हिज्र-ए-यार में

گھبرا کے جان دی ہو اگر ہجر یار میں

शायर: Raft Bahraichi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घबरा के जान दी हो अगर हिज्र-ए-यार में
अल्लाह दो घड़ी भी न दे सुख फ़रार में

दिल को बुतों ने लूट लिया लूट लेने दो
क्या दख़्ल है मशिय्यत-ए-परवरदिगार में

ऐ दोस्त तुम पे मरता मैं जी कर हज़ार बार
होती जो मौत-ओ-ज़ीस्त मिरे इख़्तियार में

मैं मर गया तो हूँ मगर अल्लह-रे इंतिज़ार
आँखें खुली हैं हसरत-ए-दीदार-ए-यार में

महशर का दिन है अब तो दिखा दीजिए जमाल
ज़िंदा हुआ हूँ मर के इसी इंतिज़ार में

ये कह के हम ने जान दी क़दमों पे यार के
आने न देंगे फ़र्क़ कभी ए'तिबार में

घबरा रहा है देर से 'राफ़त' हमारा दिल
आओ चलो भी सैर करें कू-ए-यार में