उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sanbhaal qalb-o-jigar tegh uTha nazar na bacha

सँभाल क़ल्ब-ओ-जिगर तेग़ उठा नज़र न बचा

سنبھال قلب و جگر تیغ اٹھا نظر نہ بچا

शायर: Kaifi Sanbhali5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सँभाल क़ल्ब-ओ-जिगर तेग़ उठा नज़र न बचा
तिरा गुमाँ ये ग़लत है कि कोई सर न बचा

कोई दिया कोई बादल कोई शजर न बचा
हवा चली तो कोई नक़्श-ए-मोतबर न बचा

सनद लिए हुए परवाज़ की फ़ज़ाओं से
मैं यूँ ज़मीन पे उतरा कि कोई पर न बचा

ब-जुज़ अमल कोई निस्बत न काम आएगी
ख़ुदा के क़हर से तो 'नूह' का पिसर न बचा

अजीब मा'रका ये वहम-ओ-ए'तिबार में था
उसी की तेग़ चली और उसी का सर न बचा