उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab mere pas faqat Dhaal hai talwar nahin

अब मिरे पास फ़क़त ढाल है तलवार नहीं

اب مرے پاس فقط ڈھال ہے تلوار نہیں

शायर: Kaifi Sanbhali6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब मिरे पास फ़क़त ढाल है तलवार नहीं
मैं ज़मीं-दार का बेटा हूँ ज़मीं-दार नहीं

रेंगते साँप नज़र आते हैं हर-सू मुझ को
कैसे कह दूँ कि ये फ़िरऔन का दरबार नहीं

ज़िंदगी कैसे गुज़ारेंगे न जाने अपनी
मेरे बच्चों में ज़रा भी कोई मक्कार नहीं

क़स्र-ए-शाही का समझ लेना न हिस्सा ख़ुद को
तू कि दीवार का साया है तू दीवार नहीं

एक मुद्दत हुई अंगारों पे सोते सोते
फिर भी इस वक़्त तलक क़ौम ये बेदार नहीं

है ज़मीनों के ख़रीदार तो लाखों 'कैफ़ी'
आसमानों का मगर कोई ख़रीदार नहीं