उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samajh na pai ki kya be-mahaar chahta tha

समझ न पाई कि क्या बे-महार चाहता था

سمجھ نہ پائی کہ کیا بے مہار چاہتا تھا

शायर: Ushba Tabeer11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समझ न पाई कि क्या बे-महार चाहता था
अजीब शख़्स था ख़ुद से फ़रार चाहता था

वो मेरी अर्ज़ भी हुकमन शुमार करने लगा
वो हर तरह से मिरा ए'तिबार चाहता था

उसे क़ुबूल थी वैसे तो मेरी मजबूरी
मगर वो मुझ पे ज़रा इख़्तियार चाहता था

जवाँ दिलों के मराहिल तो तय किए सारे
मगर वो वस्ल में कुछ इंतिज़ार चाहता था

तमानियत न मिली मुझ को फिर किसी सूरत
कि मेरा दिल भी तो होना फ़िगार चाहता था

कभी न अश्क बहाओगी मुझ से वा'दा करो
वो प्यार में भी फ़क़त इक़्तिदार चाहता था

बस इक अना थी कि जिस ने डुबो दिया उस को
मगर वो फिर भी उसी का हिसार चाहता था

तमाम शर्तों पे सर को है ख़म किया मैं ने
कि इश्क़ दर्द का इक कोहसार चाहता था

सभी चराग़-ए-मोहब्बत बुझा दिए उस ने
कि वो हवा पे भी होना सवार चाहता था

वो थक गया था मोहब्बत की आरज़ू करते
बिछड़ के मुझ से वो शायद क़रार चाहता था

ये दास्ताँ भी उसी शख़्स ने लिखी 'उश्बा'
तवील क़िस्से में जो इख़्तिसार चाहता था