उर्दू शायरी · ग़ज़ल

safar ki shart pe jo bhi bani guzari hai

सफ़र की शर्त पे जो भी बनी गुज़ारी है

سفر کی شرط پہ جو بھی بنی گزاری ہے

शायर: Daniyal Zaman5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सफ़र की शर्त पे जो भी बनी गुज़ारी है
बदल बदल के जगह ज़िंदगी गुज़ारी है

कोई सलाख़-नशीं सर उठा के देखेगा
दरीचे से किसी ने रौशनी गुज़ारी है

किसी इज़ाफ़े की मुझ में नहीं है गुंजाइश
बदन समेटने में ज़िंदगी गुज़ारी है

पुकारना किसी का हुक्म लग रहा था मुझे
बस एक तिनके पे मैं ने नदी गुज़ारी है

'ज़मान' कैसा चमकदार है हुनर तेरा
कि तू ने ख़ुश्क बदन से नमी गुज़ारी है