उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jhuT sach KHwab yaqin wahm guman marte hain

झूट सच ख़्वाब यक़ीं वहम गुमाँ मरते हैं

جھوٹ سچ خواب یقیں وہم گماں مرتے ہیں

शायर: Daniyal Zaman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

झूट सच ख़्वाब यक़ीं वहम गुमाँ मरते हैं
जो कहीं भी नहीं मरते वो यहाँ मरते हैं

सल्ब हो जाएगी बीनाई हमेशा के लिए
तेरी आँखों में अगर ख़्वाब-रसाँ मरते हैं

जीने लग जाएँ तो हम जीते हैं बे-नक़्श-ओ-नुमूद
मरने लग जाएँ तो बेनाम-ओ-निशाँ मरते हैं

शोर के लुत्फ़ से आलूद हैं सब गलियाँ और
किसी कोने में पड़े अहल-ए-ज़बाँ मरते हैं

किसी मज़हर से नुमूदार नहीं हो पाते
आख़िरश गुम-शुदा-ए-ज़ीस्त कहाँ मरते हैं

कच्ची उम्रों में ग़लत फ़ैसले करते हैं 'ज़मान'
तेरे मायूस हमेशा से जवाँ मरते हैं