उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabr se TuTa hua zabt se haara hua main

सब्र से टूटा हुआ ज़ब्त से हारा हुआ मैं

صبر سے ٹوٹا ہوا ضبط سے ہارا ہوا میں

शायर: Idris Azad11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब्र से टूटा हुआ ज़ब्त से हारा हुआ मैं
जितना बाक़ी बचा हूँ उतना तुम्हारा हुआ मैं

फूल खिलते गए बनता गया तन गुलदस्ता
देखते देखते ज़ख़्मों से नज़ारा हुआ मैं

उम्र-भर दुनिया के ईंधन में पकाया गया हूँ
आप के चाक से ना-पुख़्ता उतारा हुआ मैं

अब ज़मीं-ज़ाद मुझे देख के रह देखते हैं
ऊँचा उड़ता गया इतना कि सितारा हुआ मैं

चुनने वालों का भला हो जो मुझे ढूँड के लाए
टुकड़े-टुकड़े को मिला कर ही तो सारा हुआ मैं

ज़िंदगी एक जुआरी का गुज़ारा हुआ पल
और उस पल के शबिस्तान में हारा हुआ मैं

जब मिरे दिल का मचलता हुआ अरमाँ हुए आप
आप की जुम्बिश-ए-अबरू का इशारा हुआ मैं

आप को देख के काफ़िर हुआ था शूमी-ए-बख़्त
आप से मिल के मुसलमान दोबारा हुआ मैं

अब किसी लौह-ए-लहद की तरह मिटता हुआ नक़्श
और फिर हश्र में इक नाम पुकारा हुआ मैं

अपनी देरीना रिवायात का सौदा कर के
अपने अज्दाद की दौलत का ख़सारा हुआ मैं

सालहा-साल निगाहों के चलन सीखे हैं
अब कहीं जा के ज़माने को गवारा हुआ मैं