उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabhi samton ko Thukra kar uDi jae

सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए

سبھی سمتوں کو ٹھکرا کر اڑی جائے

शायर: Chandra Parkash Shad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए
कहाँ तक जाने गर्द-ए-गुम-रही जाए

बचा कर अपने साए को कहाँ रखूँ
कि शब तो हर तरफ़ को फैलती जाए

कोई दीवार है तेरी समा'अत भी
कि जो आवाज़ आए लौटती जाए

न पहरों लिख सकूँ मैं कोई बात अपनी
'अजब सी गर्द काग़ज़ पर जमी जाए

अचानक टूट जाए क़स्र-ए-तन्हाई
कोई आवाज़ खिड़की खोलती जाए

सुना है मैं सदाओं का समुंदर हूँ
ये सन्नाटा कहीं मुझ को न पी जाए

वहाँ बसने की ख़्वाहिश मुँह तके मेरा
इमारत बनते बनते टूटती जाए

उभरते जाएँ रंगों के खुले मंज़र
मगर बे-फ़ुर्सती आँखों को सी जाए

यूँ ही खपते न जाएँ रोज़-ओ-शब में हम
कभी तो बात बे-मौसम भी की जाए

ये तुम किस के लिए जलते हो गोशों में
चलो छत पर सड़क तक रौशनी जाए