उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan ko apni bisat tak to pasarna tha

बदन को अपनी बिसात तक तो पसारना था

بدن کو اپنی بساط تک تو پسارنا تھا

शायर: Chandra Parkash Shad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन को अपनी बिसात तक तो पसारना था
हर एक शय को लहू के रस्ते गुज़ारना था

जिधर फ़सीलों ने उस को मोड़ा ये मुड़ गई है
हवा की मौजों में कोई कौंदा उतारना था

तो क्या सबब सात पानियों को न पी सके हम
ख़ुद अपना डूबा हुआ जज़ीरा उभारना था

मैं अपने अंदर सिमट गया एक लम्हा बन कर
कहीं तो अपने जनम का मंज़र गुज़ारना था

तुम आ गए क्यूँ वुजूद की ये बरात ले कर
हमें तो अपनी रगों में शमशान उतारना था

यहाँ से कट कर वो जा के जंगल में सो गई हैं
उसी बहाने हवाओं को खेल हारना था

न ब्रिज टूटे न आँख झपकी न वक़्त बीता
न जाने क्या कुछ बिसरना था क्या बिसारना था