उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi hawa ne kabhi uDte pattharon ne kiya

कभी हवा ने कभी उड़ते पत्थरों ने किया

کبھی ہوا نے کبھی اڑتے پتھروں نے کیا

शायर: Chandra Parkash Shad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी हवा ने कभी उड़ते पत्थरों ने किया
हमें तो नश्र अजब सी वज़ाहतों ने किया

तमाम मंज़र-ए-शब ढेर हो गया दिल पर
ये क्या सितम मिरे क़दमों की आहटों ने किया

हर एक चीज़ लगी टूटती सी बाहर की
कि जो किया मिरे अंदर के मंज़रों ने किया

खुली न आँख कभी एक पल को सहरा की
अगरचे शोर बहुत उड़ती बस्तियों ने किया

उधर तो कुछ न था यूँ ही वो आते जाते रहे
अजब मज़ाक़ सफ़र से मुसाफ़िरों ने किया

मैं अपने आप से डरने लगा भरे घर में
ये मुझ से क्या मिरे अपने ही आइनों ने किया

कई तरह से घटाया बढ़ाया सायों को
मकाँ मकाँ पे यही काम सूरजों ने किया