उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil se ek aag ki diwar ubharti jae

दिल से इक आग की दीवार उभरती जाए

دل سے اک آگ کی دیوار ابھرتی جائے

शायर: Chandra Parkash Shad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल से इक आग की दीवार उभरती जाए
ज़ीना ज़ीना शब-ए-तन्हाई उतरती जाए

तुम से मिलने का जो बरसों में कभी आए ख़याल
हर तरफ़ फ़ासलों की रेत बिखरती जाए

वक़्त की चाल को हम रो के रहें कमरे में
और इधर रात अंधा धुँद गुज़रती जाए

तपता सहरा है हर इक शहर और उम्मीद-ए-सुकूँ
एक बदली है जो ऊपर से गुज़रती जाए

मैं तो औक़ात के फैलाओ में बढ़ता जाऊँ
और जो इक शय मिरे अंदर है वो मरती जाए

जाने क्या भूत छुपे बैठे हैं इस आँगन में
रात जाए तो वहाँ काँपती डरती जाए

वो नज़र फूल खिलाती चले पहलू पहलू
बन के काँटा सा दिलों में भी उतरती जाए