उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sath mausam ke hawa ko bhi machal jaana tha

साथ मौसम के हवा को भी मचल जाना था

ساتھ موسم کے ہوا کو بھی مچل جانا تھا

शायर: Chitra Bhardwaj suman6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साथ मौसम के हवा को भी मचल जाना था
धूप को शम्स की बाहोँ में पिघल जाना था

शाम से सुब्ह तलक दिल था तिरी सरहद में
ऐसे हालात में तो तीर को चल जाना था

आओ अब देखो धुआँ होते हुए छप्पर को
या तो चिंगारी के लगते ही सँभल जाना था

याद यूँ भी नहीं रखने थे हमें कुछ रिश्ते
बा'द इक वक़्त के मतलब ही बदल जाना था

उस की जानिब से ही कोशिश में कमी थी वर्ना
अब के भी तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ उसे खल जाना था

चाक के हाथ खड़े करने से पहले ही 'सुमन'
तेरी मिट्टी को किसी शक्ल में ढल जाना था