उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sath jine ka tere haq jo agar mil jata

साथ जीने का तिरे हक़ जो अगर मिल जाता

ساتھ جینے کا ترے حق جو اگر مل جاتا

शायर: Parvez Shaikh5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साथ जीने का तिरे हक़ जो अगर मिल जाता
दिल मिरा बाग़ के फूलों की तरह खिल जाता

ख़ुद को मैं गर न बचा पाता हसीनाओं से
जान से मेरा हमेशा के लिए दिल जाता

लश्करी आँखो से बचता न अगर मैं उस की
ख़ाक में ख़ुद में हमेशा के लिए मिल जाता

मेरा मुश्किल में कोई साथ नहीं देता अगर
क़त्ल कर के जो मिरा सर कोई क़ातिल जाता

रंग उड़ जाता तिरे रुख़ का भी 'परवेज़' मियाँ
तू वफ़ा के बने ख़ंजर से अगर छिल जाता