उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saqiya mar ke uThenge tere mai-KHane se

साक़िया मर के उठेंगे तिरे मय-ख़ाने से

ساقیا مر کے اٹھیں گے ترے مے خانے سے

शायर: Zaheer Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साक़िया मर के उठेंगे तिरे मय-ख़ाने से
अहद-ओ-पैमाँ हैं यही ज़ीस्त में पैमाने से

तू कहाँ आई मिरा दर्द बटाने के लिए
ऐ शब-ए-हिज्र निकल जा मिरे ग़म-ख़ाने से

कौन होता है मुसीबत में किसी का दिल-सोज़
उठ गई शम्अ' भी जल कर मिरे काशाने से

कुछ यही कोहकन-ओ-क़ैस पे गुज़री होगी
मिलती-जुलती है कहानी मिरे अफ़्साने से

जुब्बा-फ़रसा-ए-दर-ए-का'बा थे कल तक तो 'ज़हीर'
गिरते पड़ते हुए आज आते हैं मयख़ाने से