उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahabo manzil-e-jaanan ki taraf jaana mat

साहबो मंज़िल-ए-जानाँ की तरफ़ जाना मत

صاحبو منزل جاناں کی طرف جانا مت

शायर: M Kothiyavi Rahi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साहबो मंज़िल-ए-जानाँ की तरफ़ जाना मत
और जाना तो कहानी कोई दोहराना मत

गुल खिला देगा महकते हुए चेहरों का तिलिस्म
शहर-ए-आईना दिल-ए-ज़ार को दिखलाना मत

मुझ को चाहा है तो बख़्शो मिरी चाहत को दवाम
बन के रह जाना ढली रात का अफ़्साना मत

वस्ल की चाह में रुकना न किसी जिस्म के पास
दौलत-ए-हिज्र को सौदाइयो ठुकराना मत

सर-बुरीदा सी गुज़र जाना शहीदों की तरह
तितलियो दिल के दबिस्ताँ में ठहर जाना मत

उल्फ़तें सब को मयस्सर नहीं होतीं प्यारे
तिश्ना लम्हों की मुलाक़ात से उकताना मत

मक़्तल-ए-इश्क़ न अब कूचा-ए-क़ातिल 'राही'
शहर-ए-बे-ख़्वाब में जाते हुए घबराना मत