उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruh jismon se bahar bhaTakti rahi

रूह जिस्मों से बाहर भटकती रही

روح جسموں سے باہر بھٹکتی رہی

शायर: Iffat Zarrin5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रूह जिस्मों से बाहर भटकती रही
ज़ख़्मी यादों को आँचल से ढकती रही

मेरे हाथों में थीं गर्द की चादरें
ज़िंदगी थी के दामन झटकती रही

चाँदनी में हसीं ज़हर घुलता रहा
सर को मरमर पे नागिन पटकती रही

मैं घटाओं से ख़ुद को बचाती रही
तेग़ बिजली की सर पे लटकती रही

मेरे होंटों को कब मिल सकी बाँसुरी
साँस 'ज़र्रीं' लबों पे अटकती रही