उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dur tak phaile rahe tanhaiyon ke silsile

दूर तक फैले रहे तन्हाइयों के सिलसिले

دور تک پھیلے رہے تنہائیوں کے سلسلے

शायर: Iffat Zarrin5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दूर तक फैले रहे तन्हाइयों के सिलसिले
आँसुओं की धुंद में परछाइयों के सिलसिले

एक तो सावन का मौसम उस पे माज़ी की फुवार
ज़ख़्म ताज़ा कर गए पुरवाइयों के सिलसिले

डूबते जाते हैं साहिल गिरते जाते हैं मकाँ
बढ़ रहे हैं हर तरफ़ अँगनाइयों के सिलसिले

सत्ह-ए-दरिया से न गहराई का अंदाज़ा हुआ
डूब कर हम को मिले गहराइयों के सिलसिले

आज दुनिया कह रही है जिन को 'ज़र्रीं' देवता
उन के माज़ी में भी हैं रुस्वाइयों के सिलसिले