उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aable sukh chuke phir bhi kasak baqi hai

आबले सूख चुके फिर भी कसक बाक़ी है

آبلے سوکھ چکے پھر بھی کسک باقی ہے

शायर: Iffat Zarrin6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आबले सूख चुके फिर भी कसक बाक़ी है
दिल के हर ज़ख़्म में यादों की महक बाक़ी है

छोड़ दूँ कैसे भला अपने बुज़ुर्गों का चलन
मेरी रग रग में अभी उन का नमक बाक़ी है

जिन के साए में बहल जाता था बचपन अक्सर
मेरे एहसास में अब तक वो धनक बाक़ी है

तुम को आना है तो आ जाओ ब-सद-शौक़ यहाँ
अब भी हालात में हल्की सी लचक बाक़ी है

बंद होती नहीं पलकें मिरी सदियाँ गुज़रीं
ख़्वाब तो टूट चुके सिर्फ़ चमक बाक़ी है

दिल की धड़कन मिरी आवाज़-ए-अना है 'ज़र्रीं'
मेरे हर लफ़्ज़ में लहजे की खनक बाक़ी है