उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ruKH se fitrat ke hijabaat uTha deta hai

रुख़ से फ़ितरत के हिजाबात उठा देता है

رخ سے فطرت کے حجابات اٹھا دیتا ہے

शायर: Gauhar Usmani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रुख़ से फ़ितरत के हिजाबात उठा देता है
आइना टूट के पत्थर को सदा देता है

अज़्मत-ए-अहल-ए-वफ़ा और बढ़ा देता है
ग़म-ए-मुसलसल हो तो फिर ग़म भी मज़ा देता है

दिल धड़कता है तो पहरों नहीं सोने देता
नींद आती है तो एहसास जगा देता है

तुम ने शायद कभी इस बात को सोचा होगा
वक़्त हाथों की लकीरें भी मिटा देता है

जो मिरे क़त्ल के दरपय था न जाने कब से
आज वो भी मुझे जीने की दुआ देता है

अपने किरदार पे मौजों को भी शर्म आती है
जब कोई डूब के साहिल का पता देता है

ग़म की तौफ़ीक़ भी सब को नहीं मिलती 'गौहर'
ये वो ने'मत है जो मुश्किल से ख़ुदा देता है