उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raushni ke jo talabgar hue hum donon

रौशनी के जो तलबगार हुए हम दोनों

روشنی کے جو طلب گار ہوئے ہم دونوں

शायर: Tahir Azeem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रौशनी के जो तलबगार हुए हम दोनों
एक सूरज के ख़रीदार हुए हम दोनों

जो मसीहा की तरह हम से मिला था इक दिन
उसी बीमार के बीमार हुए हम दोनों

उस कहानी का तो लिखना कभी मुमकिन न हुआ
जिस कहानी के भी किरदार हुए हम दोनों

चाँद हो तुम तो कोई एक सितारा मैं हूँ
शाम होते ही नुमूदार हुए हम दोनों

फूल वो और किसी नाम के आए थे 'अज़ीम'
जिन की ख़ुशबू में गिरफ़्तार हुए हम दोनों