उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek anokhi rasm ko zinda rakha hai

इक अनोखी रस्म को ज़िंदा रखा है

اک انوکھی رسم کو زندہ رکھا ہے

शायर: Tahir Azeem8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक अनोखी रस्म को ज़िंदा रखा है
ख़ून ही ने ख़ून को पसपा रखा है

अब जुनून-ए-ख़ुद-नुमाई में तो हम ने
वहशतों का इक दरीचा वा रखा है

शहर कैसे अब हक़ीक़त-आश्ना हो
आगही पर ज़ात का पहरा रखा है

तीरगी की क्या अजब तरकीब है ये
अब हवा के दोश पर दीवा रखा है

तुम चराग़ों को बुझाने पर तुले हो
हम ने सूरज को भी अब अपना रखा है

तुम हमारे ख़ून की क़ीमत न पूछो
इस में अपने ज़र्फ़ का अर्सा रखा है

शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ
ज़ेहन में पर गाँव का नक़्शा रखा है

ये 'अज़ीम' अपना कमाल-ए-ज़र्फ़ है जो
दुश्मनों के ऐब पर पर्दा रखा है