उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek zarurat mein sarf ho gae the

इक ज़रूरत में सर्फ़ हो गए थे

اک ضرورت میں صرف ہو گئے تھے

शायर: Tahir Azeem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक ज़रूरत में सर्फ़ हो गए थे
फिर मिरे हाथ बर्फ़ हो गए थे

लफ़्ज़ की तरह थे कभी हम लोग
और फिर हर्फ़ हर्फ़ हो गए थे

शहर की हर गली कुशादा थी
लोग ही तंग-ज़र्फ़ हो गए थे

सख़्त गर्मी थी उन दिनों लेकिन
अपने जज़्बात बर्फ़ हो गए थे

जितने आँसू थे मेरी आँखों में
नौजवानी में सर्फ़ हो गए थे