उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raushni aadmi tirgi aadmi

रौशनी आदमी तीरगी आदमी

روشنی آدمی تیرگی آدمی

शायर: Tabish Mehdi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रौशनी आदमी तीरगी आदमी
ज़िंदगी आदमी मौत भी आदमी

है सरापा-ए-जुर्म-ओ-बदी आदमी
खो चुका अपनी पहचान भी आदमी

आदमी आदमी हैं बराबर मगर
सोचता ही नहीं ये कोई आदमी

आदमी आदमी ही से बेज़ार है
पस्त है किस क़दर वाक़'ई आदमी

जिस ने बख़्शी थी लाखों को आज़ादियाँ
है असीर-ए-ग़ुलामी वही आदमी

हर किसी को ख़ुशी-आश्ना कर गया
बज़्म में आ के इक अजनबी आदमी

कितना पस्त आदमियत का मे'यार है
सोचता ये भी 'ताबिश' कभी आदमी