उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab to charagh-e-fikr jalata nahin koi

अब तो चराग़-ए-फ़िक्र जलाता नहीं कोई

اب تو چراغ فکر جلاتا نہیں کوئی

शायर: Tabish Mehdi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब तो चराग़-ए-फ़िक्र जलाता नहीं कोई
सोज़-ए-यक़ीं की बज़्म सजाता नहीं कोई

पथराव हो रहा है हमारे मकान पर
क्या जुर्म हो गया है बताता नहीं कोई

अपने पड़ोसियों की हिफ़ाज़त के वास्ते
रातों की मीठी नींद गँवाता नहीं कोई

ग़म तो कहानियों की तरह सब ने सुन लिया
लेकिन कोई 'इलाज बताता नहीं कोई

जब से तिरी गली का पता मिल गया हमें
शहर-ए-हवस की सम्त बुलाता नहीं कोई

आबादियों में घर का बनाना तो सहल है
वीरान बस्तियों को बसाता नहीं कोई