उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rassi to jal gai magar ainThan nahin gai

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई

رسی تو جل گئی مگر اینٹھن نہیں گئی

शायर: Chandrashekhar Pandey Shams5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रस्सी तो जल गई मगर ऐंठन नहीं गई
चाहत तुम्हारी यूँ दम-ए-कुश्तन नहीं गई

तुम चाहते नहीं थे हमें फिर ये क्यों हुआ
अब भी तुम्हारी आँखों की उलझन नहीं गई

करवट बदल के काटी थी हर शब तिरे बग़ैर
आदत वो अब भी छोड़ के मदफ़न नहीं गई

सारी ख़ुदाई वैसे लगी तो रही मगर
इस दिल से तेरी याद भी दुश्मन नहीं गई

इक बुत के 'इश्क़ में तू करे है ख़ुदा-ख़ुदा
ऐ 'शम्स' तेरी ज़ात-ए-बरहमन नहीं गई