उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab shahr-e-dil mein paD gae us zar-badan ke panw

जब शहर-ए-दिल में पड़ गए उस ज़र-बदन के पाँव

جب شہر دل میں پڑ گئے اس زر بدن کے پاؤں

शायर: Chandrashekhar Pandey Shams8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब शहर-ए-दिल में पड़ गए उस ज़र-बदन के पाँव
पड़ते नहीं ज़मीन पे अब इस चमन के पाँव

वो कौन आज रातों में घर से निकल पड़ा
उठने लगे हैं शहर की सम्त आज बन के पाँव

लाओ तो धो दूँ अश्क से वो पाँव मैं ज़रा
तेरी गली से आए हैं उस बरहमन के पाँव

कहता हूँ दिल में आने को आता नहीं है वो
रखता नहीं है सिल पे वो अपने सनम के पाँव

आया तो दिल में बैठ गया बन के देवता
उट्ठे नहीं हैं 'इश्क़-ए-दिल-ए-बुत-शिकन के पाँव

‘इरफ़ान-ए-'इश्क़ तोड़ दे ज़ंजीर-ए-फ़े'ल को
रुक जाएँ अपने आप ही आवागवन के पाँव

अब तक है क़ल्ब-ए-'शम्स' से रौशन ये ख़ल्क़ बस
इक बार पड़ गए थे जो शो'ला-बदन के पाँव

सारे तमद्दुनों का है ख़तरे में अब वजूद
थमते नहीं हैं पर कभी गंग-ओ-जमन के पाँव